मणिपुर के मपीथेल जलाशय में छोटा मछली बीज सीधे विशाल पानी में छोड़ने के बजाय पहले सीमित घेरे में बड़ा किया गया। यह घेरा ‘पेन’ है—जलाशय के भीतर जाल या दीवार से बना ऐसा हिस्सा जिसमें प्राकृतिक पानी आता-जाता है, पर मछली नियंत्रित क्षेत्र में रहती है। ICAR-CIFRI के विवरण के अनुसार मपीथेल बांध प्रभावित मत्स्य सहकारी समिति नवंबर 2016 में 370 सदस्यों के साथ पंजीकृत हुई थी।
प्रशिक्षण, दो पेन और 50,000 बीज
समूह के 14 मछुआरों ने 22–28 जुलाई 2022 को जलाशय मत्स्य प्रबंधन का प्रशिक्षण लिया। इसके बाद दो पेन, 50,000 भारतीय प्रमुख कार्प के बीज, दो टन पेलेट चारा और एक मोटर वाली FRP नाव दी गई। सितंबर 2022 में कतला, रोहू और मृगल को 2:1:1 के अनुपात में पेन में रखा गया। जनवरी 2023 तक चले पाँच महीने के रिकॉर्ड में जीवित रहने की दर 80 से 88 प्रतिशत रही। संस्थान ने दोनों पेन से करीब 8.1 टन मछली मिलने की सूचना दी।
फसल बेचने के बजाय जलाशय में छोड़ा
पेन से निकली मछलियों को जलाशय में आगे बढ़ने के लिए छोड़ दिया गया। इस प्रक्रिया में छोटा बीज पहले एक सीमित, देखरेख वाले हिस्से में बढ़ता है और फिर खुले जलाशय में पहुँचता है। आधिकारिक विवरण में जलाशय के भविष्य के उत्पादन और आय के अनुमान भी हैं; उन्हें इस परीक्षण की दर्ज कमाई नहीं माना गया है।
दूसरी मत्स्य समितियों के लिए इस उदाहरण में रखरखाव का क्रम उपयोगी है: प्रशिक्षण, घेरा तैयार करना, बीज डालना, चारा देना, जीवित मछली का रिकॉर्ड और अंत में जलाशय में छोड़ना। मपीथेल का यह विवरण सितंबर 2022–जनवरी 2023 का है; उससे आज की समिति की आय या जलाशय की वर्तमान उपज का पता नहीं चलता।
मुख्य बातें
- 370 सदस्यों वाली मपीथेल बांध प्रभावित मत्स्य सहकारी समिति 2016 में पंजीकृत हुई थी।
- 14 मछुआरों ने जुलाई 2022 में प्रशिक्षण लिया; दो पेन, 50,000 बीज और दो टन चारा कार्यक्रम में दिया गया।
- सितंबर 2022 से जनवरी 2023 तक पेन में पाली मछलियों की जीवित रहने की दर 80–88 प्रतिशत रही और फिर उन्हें जलाशय में छोड़ा गया।
स्रोत और संदर्भ
- Indian Council of Agricultural Research / ICAR-CIFRI · Tribal fishers demonstrated IMC fingerling raising using Pen culture technology in Mapithel Reservoir of Manipur: A success story ↗प्रकाशन-तिथि उपलब्ध नहीं
सार्वजनिक प्राथमिक स्रोतों पर आधारित संपादित लेख। स्रोत जाँच: 16 सितंबर 2026।



